أُمّى.. جَنّة أرض!

الكاتب:أحمد الغرباوى-مصر

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شبكة المدونون العرب - الكاتب:أحمد الغرباوى-مصر

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أُمّى.. جَنّة أرض!
(3)
بَاعوا يا أمى البَيّت..
قبضوا الثمن غيرة.. وغُبن..
تَمسّحت بجدرانك.. مُحتفظة بريحة عَرقك..أشمّ عِطر رِضى الربّ.. لازِلت..
لملمت أوراقى.. وحَوْلى فُراق جُثث.. جُثث تَمشى في لَحد..
قسّموا يا أمّى الأرض..
قَبضوا الثمن حَسد وغِلّ.. وسِباق على اكتناز رِقّ..
ولذّة حَرام في شَهْوة عِرض..
الكُلّ مَرضى.. وبِدل طمع في رَحْمِة رَبّ..
تسابق عَلى لمّ أطباق.. مِنْ على مَائدة سُحت!
أمّاه..
روحك للمكوث أبَتْ.. و
أبَيْتِ..!
رَفْضتِ الدّواء
من تلوّث أيدٍ وللشفاء تَمَنّعَتِ و
عن عمد رفضتِ؛ وأبيتِ..!
ومعك الحُبّ أخذتِ و
رحلتِ..!
ولمّا لأختى اشتقتِ..
مَددتِ الحَبْلَ
بذنوب ثقلت
اتعلّقتُ أنا وما
سَحَبْتِ..!
وَحْدَها أختى
من بئر جُبّ
اخترتِ..!
كانت لنا صدر
وريحة جلبابك في حُضن..
كانت لنا..
لنا كانت
أنْتِ..!
كانت لنا
أنْتْ..!
أمّاه..
طالَ النّوى..!
ورمانى الدّجى
ظُلمة سَواد عِشْقٍ
وخِرق بالية عُرِىّ زُهْدٍ
ولازلتِ..!
جُثة على شطّ
ما عاد لمِلْحِ اليّم
طعم..!
ما عَاد لمَىّ جارٍ
عَذب..!
كما رحلتِ.. مات
يموت بين الحنايا نهر
الحُبّ..!
مَات حُبّ لمّا..
لمّا كُنْتِ
وفي النهر نهرٌ
سِلتِ..!
أمّاه..
علّمتينى:
أن الكلمة حُبّ..!
أن اللقمة حُبّ..!
فآثر القلب العِشْقَ قطعة خُبز..!
فأبْتُ الرّوح إلا..
إلا أن تحترق..
فاحترقت في فُرن..!
أمّى..
ألف ألف عام..
ولازِلتُ في حُضنك
أغنّى..!
وتعجّب من يَهمّه الأمر:
لا العجين عَفن..؟
ولا في الحرار لَسْع..؟
كان..
في القلب كان حُبّ..!
حُبّ يموت..
مَات يوم افتقد تماسّ
حِسّ..!
أمّاه..
أذقت الأرض طعم الوصل..
وروحك كانت تغزل العُمْرِ قِطعَ لحم..
وتطهرها غسلا بدمّ..
داومنا فِعْل الحُبّ..
وتكشّفت أقنعة عن وجوه تأبى روحها دوام اللمس..
وتهرول للبُعْادِ والفصل..
تقطعت حِبْال ودّ..
وشبق يسعى لاغتصاب رحم..
لابدّ..!
ولكنا مَددناه..
مَددناه في صمت..!
في الله وصيّة وصل..!
بلا مأوى من سكن حضورك..
وبين عراء تهدّم حجارة قديم بيت..
أَنرنا قنديل الأمس..
نادتنا لمّة جدتى.. والسمن البلدى.. والكرم الطائى.. ورغيف خبز.. وطبق فول.. وبصلايْة حمراء.. وأقراص طعميّة.. وباذنجان مقلى في زيت.. و..
ونداك البرىء:
يابنى
هوّه الواحد إيه غير هِدْمة ولقمة هَنيّة..!
وفناجين القهوة الغامقة.. وصوانى شاى المسائيّة..
و(صدّيقة).. و(أمّ حَسْن).. و(عظيمة).. و
 وستّات وأحفاد كتير بتِمْلى البَيْت..
ونميمة بريئة لحدّ الفجرية..
لا فيه صُبح.. ولا ضهر.. ولاعصريّة..
مِأكّله كُلّ الناس ودّ وحِنّية..
ومِدْاريّة وَجعك.. وحُضنك للكُلّ مِدْفيّة..!
فين دلوقتى الحياة دِيّة..؟
بَسّ عارف إنّك في الجَنّة
وعند فاطمة الزهراء.. معاكى أختى
من بَدرى
من بدرى قوى؛ وكُنْتِ لِها مِسْتَنية..!
أمّاه..
لكن يا أمى.. على الأرض..
ماعادوا يرضوا بغير ضوء الشمس..
ونسوا أنها بقدر ما يبهر نورها.. يفضح.. وتعرّى نفوس تعش..
تعش في زيْف..!
وتطمع في زيْف..!
وتعشق في زيْف..!
وتكتنز كثير من الزّيْف..!
ويؤمّها الزيْف كل صلاة فجر..!
وفى دعاء القنوت..
 تلتمس الربّ رغبة احتواء.. وشبق أخذ..
وكأنها في المِسا قد أفرغت خزائن الزيّف..!
وظنوا لَمّا نصل جسراً.. أمس كُنْتِ بالحُبّ شيّدتيه..
اعتقدوا أن ماتركتيه ليْسَ بحقّ..!
وتغاضوا عن أمر الربّ..!
وغشوا بصيرتهم عن عين الربّ..؟
ورفضوا اليدّ لمّا مددناها..
تلتمس العدل.. ولم تكن تشحذ.. ولا لحسنة ترغب.. تحرث في الله حقل..!
رفضوا الأكل.. طالما سيشاركهم حَدّ.!
وكل قطعة لحم في أجسادهم..
وحِنيّة روح؛ هي أحمر أوردتهم وشرايينهم..
وموصولة في حُمرة خدود أحفادهم..
هي من روح الربّ إلى أودعها عندك..
ثِمْار جنّة أرض..!
أمى لاتحزنى..
فلم يُطرد يوماً أحد من جنّتك..؟
ولو قطع وصلٌ لِسْانَ حَقّ.. فتراتيل الروح دُعْا ربّ..!
دُعْا ربّ..!
لو ترنّح بُعاد على سُكْرِ دَما قلب..
فلا زلتُ..
لازلتُ يا أمى في حُضْنكِ أُغنّى..
ودوام حاضر أنْتِ..
أنْتِ لى جنّة
جَنّة أرض..!

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